
तीन पीढ़ियाँ · एक ही दरवाज़ा
हमारी कहानी
एक थान कपड़ा और भारती स्ट्रीट का एक कोना — शुरुआत यहीं से हुई। के. गोपालकृष्ण भट का मानना था कि पहाड़ी कस्बे को उससे बेहतर मिलना चाहिए जो घाट चढ़ाकर लाना आसान हो — इसलिए वे बेहतर ही लाए, और उसे पूरे परिवार की दुकान कहा।
उनके बेटे ने उसे उसी तरह बढ़ाया: धीरे-धीरे, हाथों से — एक भरोसेमंद बुनकर, एक लौटकर आने वाला ग्राहक। साड़ियाँ और निखरती गईं। वादा वही रहा।
आज बेटा और उसका परिवार दुकान सँभालते हैं — उसी लकड़ी के काउंटर के पीछे तीन पीढ़ियाँ, उसी गली में — कस्बे की शादियों और आम सुबहों, दोनों को कपड़े पहनाते हुए।
“ग्राहक को वह कभी मत बेचो जो तुम खुद घर न ले जाओ।”
— संस्थापक का एक ही नियम, आज भी दीवार पर




